स्कूल के जमाने में रहीम और कबीर के दोहे खूब पढ़े थे, फ़िर बम्बई में आ गये तो हिन्दी से नाता टूट गया। नेट का भी कोई ज्ञान न था, अक्सर मन करता था कि फ़िर वही रहीम और कबीर के दोहे पढ़ पायें, बारह साल पहले जब अनूप जी को ये भजन के रूप में गाते सुना तो ऐसा लगा मानो तपते तवे पे पानी की बूंदें छ्न्न से पड़ी हों और मन गा उठा पायो जी मैं ने राम रत्न धन पायो